HomeReligionFirst Tirthankara: जैन धर्म के प्रथम तीर्थंकर - भगवान ऋषभदेव

First Tirthankara: जैन धर्म के प्रथम तीर्थंकर – भगवान ऋषभदेव

First Tirthankara in Hindi:भगवान ऋषभदेव जैन धर्म के प्रथम तीर्थंकर हैं। तीर्थंकर का अर्थ होता है जो तीर्थ की रचना करें। जो संसार सागर (जन्म मरण के चक्र) से मोक्ष तक के तीर्थ की रचना करें, वह तीर्थंकर कहलाते हैं। भगवान ऋषभदेव जी को आदिनाथ भी कहा जाता है। भगवान ऋषभदेव वर्तमान अवसर्पिणी काल के प्रथम तीर्थंकर हैं |

प्रथम तीर्थंकर – भगवान ऋषभदेव (First Tirthankara of Jainism)

कुलकरों की कुल परंपरा के सातवें कुलकर नाभिराज और उनकी पत्नी मरुदेवी से भगवान ऋषभदेव का जन्म चैत्र कृष्ण की अष्टमी-नवमी को अयोध्या में हुआ। इनके दो पुत्र भरत और बाहुबली तथा दो पुत्रियां ब्राह्मी और सुंदरी थीं। ऋषभदेव स्वायंभुव मनु से पांचवीं पीढ़ी में इस क्रम में हुए- स्वायंभुव मनु, प्रियव्रत, अग्नीघ्र, नाभि और फिर ऋषभ। चैत्र माह के कृष्ण पक्ष की अष्टमी को आपने दीक्षा ग्रहण की तथा फाल्गुन कृष्ण पक्ष की अष्टमी के दिन आपको कैवल्य की प्राप्ति हुई। कैलाश पर्वत क्षेत्र के अष्टपद में आपको माघ कृष्ण 14 को निर्वाण प्राप्त हुआ। आपका प्रतीक चिह्न- बैल, चैत्यवृक्ष- न्यग्रोध, यक्ष- गोवदनल, यक्षिणी- चक्रेश्वरी हैं।

भगवान ऋषभदेव का इतिहास (History of Bhagwan Rishabhdev)

जैन पुराणों के अनुसार अन्तिम कुलकर राजा नाभिराज के पुत्र भगवान ऋषभदेव हुये। भगवान ऋषभदेव का विवाह नन्दा और सुनन्दा से हुआ। भगवान ऋषभदेव के १०० पुत्र और दो पुत्रियाँ थी। उनमें भरत चक्रवर्ती सबसे बड़े एवं प्रथम चक्रवर्ती सम्राट हुए जिनके नाम पर इस देश का नाम भारतवर्ष पड़ा। दूसरे पुत्र बाहुबली भी एक महान राजा एवं कामदेव पद से बिभूषित थे। इनके आलावा भगवान ऋषभदेव के वृषभसेन, अनन्तविजय, अनन्तवीर्य, अच्युत, वीर, वरवीर आदि 98 पुत्र तथा ब्राम्ही और सुन्दरी नामक दो पुत्रियां भी हुई, जिनको ऋषभदेव ने सर्वप्रथम युग के आरम्भ में क्रमश: लिपिविद्या (अक्षरविद्या) और अंकविद्या का ज्ञान दिया। बाहुबली और सुंदरी की माता का नाम सुनंदा था। भरत चक्रवर्ती, ब्रह्मी और अन्य ९८ पुत्रों की माता का नाम यशावती था। ऋषभदेव भगवान की आयु ८४ लाख पूर्व की थी जिसमें से २० लाख पूर्व कुमार अवस्था में व्यतीत हुआ और ६३ लाख पूर्व राजा की तरह|

भगवान ऋषभदेव का जन्म चैत्र कृष्णा नवमी तिथि को अयोध्या नगरी में  हुआ था। भगवान ऋषभदेव के माता-पिता मरुदेवी माता थीं और नाभिराय पिता थे। भगवान ऋषभदेव के १०१ पुत्र और २ पुत्रियाँ थीं। उनके पुत्र अनन्तवीर्य  ने सर्वप्रथम मोक्ष प्राप्त किया था | भगवान ऋषभदेव के पुत्र वृषभसेन ही उनके प्रथम गणधर थे। भगवान ऋषभदेव ने एक हजार वर्ष तक तपस्या की थी | भगवान ऋषभदेव को प्रथम आहार एक वर्ष ३९ दिनों के उपवास के पश्चात् प्राप्त हुआ था|

हस्तिनापुरी में राजा श्रेयांस ने उन्हें प्रथम बार इक्षुरस का आहार दिया था। भगवान ऋषभदेव के समवसरण में  चौरासी गणधर थे। ‘वृषभसेन’’ नाम के उनके पुत्र ने समवसरण में प्रथम दीक्षा लेकर प्रमुख गणधर का पद प्राप्त किया था। भगवान ऋषभदेव के बड़े पुत्र सम्राट् भरत ही उनके समवसरण में प्रमुख श्रोता थे। भगवान ऋषभदेव के समवसरण की प्रमुख गणिनी आर्यिका ब्राह्मी माताजी, जो कि भगवान ऋषभदेव की ही पुत्री थीं। फाल्गुन कृष्णा एकादशी तिथि को ‘‘पुरिमतालपुर’’ नगर के उध्यान में भगवान् ऋषभदेव एक हजार वर्ष तक तपस्या करने के बाद केवलज्ञान प्राप्त हुआ था। भगवान ऋषभदेव का शरीर स्वर्ण वर्ण का था। उनके शरीर की अवगाहना  ५०० धनुष अर्थात् दो हजार हाथ। माघ कृष्णा चतुर्दशी को कैलाश पर्वत से भगवान ऋषभदेव को निर्वाणपद की प्राप्ति हुई थी। भगवान की दिव्यध्वनि  सात सौ अठारह भाषाओं में खिरती थी | इस युग के प्रथम मोक्षगामी भगवान ऋषभदेव के पुत्र अनन्तवीर्य हुए हैं | भगवान ऋषभदेव के समस्त पुत्रों ने दीक्षा लेकर उसी भव से मोक्ष प्राप्त किया था। भगवान ऋषभदेव, अजितनाथ, अभिनंदननाथ, सुमतिनाथ और अनंतनाथ इन पाँच तीर्थंकरों ने अयोध्या में जन्म लिया है ।

कैवल्य ज्ञान (Kaivalya Gyan)

जैन ग्रंथो के अनुसार लगभग १००० वर्षो तक तप करने के पश्चात भगवान ऋषभदेव को केवल ज्ञान की प्राप्ति हुई थी। ऋषभदेव भगवान के समवशरण में निम्नलिखित व्रती थे :

  • ८४ गणधर
  • २२ हजार केवली
  • १२,७०० मुनि मन: पर्ययज्ञान ज्ञान से विभूषित 
  • ९,००० मुनि अवधी ज्ञान से
  • ४,७५० श्रुत केवली
  • २०,६०० ऋद्धि धारी मुनि
  • ३,५०,००० आर्यिका माता जी
  • ३,००,००० श्रावक

हिन्दु ग्रन्थों में वर्णन (Description in Hindu texts)

वैदिक दर्शन में ऋग्वेद, अथर्ववेद ,अठारह पुराणों व मनुस्मृति जैसे अधिकाँश ग्रंन्थो मे भगवान ऋषभदेव का वर्णन आता है| वैदिक दर्शन में भगवान ऋषभदेव को विष्णु के 24 अवतारों में से एक के रूप में संस्तवन किया गया है। वहीं शिव पुराण मे इन्हे शिवजी के अवतार के रुप मे स्थान दिया गया है | ऋषभदेव को ही हिन्दू शास्त्रों में वृषभदेव कहा गया है।

भागवत में अर्हन् राजा के रूप में इनका विस्तृत वर्णन है। श्रीमद्भागवत् के पाँचवें स्कन्ध के अनुसार मनु के पुत्र प्रियव्रत के पुत्र आग्नीध्र हुये जिनके पुत्र राजा नाभि (जैन धर्म में नाभिराय नाम से उल्लिखित) थे। राजा नाभि के पुत्र भगवान ऋषभदेव हुये जो कि महान प्रतापी सम्राट हुये। भागवत् पुराण अनुसार भगवान ऋषभदेव का विवाह इन्द्र की पुत्री जयन्ती से हुआ। इससे इनके सौ पुत्र उत्पन्न हुये। उनमें भरत चक्रवर्ती सबसे बड़े एवं गुणवान थे ये भरत ही भारतवर्ष के प्रथम चक्रवर्ती सम्राट हुए;जिनके नाम से भारत का नाम भारत पड़ा | उनसे छोटे कुशावर्त, इलावर्त, ब्रह्मावर्त, मलय, केतु, भद्रसेन, इन्द्रस्पृक, विदर्भ और कीकट ये नौ राजकुमार शेष नब्बे भाइयों से बड़े एवं श्रेष्ठ थे। उनसे छोटे कवि, हरि, अन्तरिक्ष, प्रबुद्ध, पिप्पलायन, आविर्होत्र, द्रुमिल, चमस और करभाजन थे।

भगवान ऋषभदेव जी की एक ८४ फुट की विशाल प्रतिमा भारत में मध्य प्रदेश राज्य के बड़वानी जिले में बावनगजा नामक स्थान पर है और मांगीतुंगी (महाराष्ट्र ) में भी भगवान ऋषभदेव की 108 फुट की विशाल प्रतिमा है। उदयपुर जिले का एक प्रसिद्ध शहर भी भगवान ऋषभदेव नाम से विख्यात है जहां भगवान ऋषभदेव का एक विशाल मंदिर तीर्थ क्षेत्र विद्यमान हैं जिसमें ऋषभदेव भगवान की एक बहुत ही मनोहारी सुंदर मनोज्ञ और चमत्कारी प्रतिमा विराजमान है जिसे जैन के साथ भील आदिवासी लोग भी पूजते हैं।

यह भी पढ़िए: 24 Tirthankaras: जैन धर्म के 24 तीर्थंकरों का परिचय

Manish Singhhttps://infojankari.com/
मनीष एक डिजिटल मार्केटर प्रोफेशनल होने के साथ साथ धर्म और अध्यात्म में रुचि रखते हैं। अपने आध्यात्मिक गुरुजी श्री विजय सैनी जी को दूसरा जीवनदाता मानते हैं और उनके द्वारा दिए गए उपदेशों और शिक्षा को सर्वजन तक पहुचाने की कोशिश कर रहे हैं।
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