“चितानन्द रूपः शिवोऽहम् शिवोऽहम्” न केवल एक मंत्र है, बल्कि यह आत्मबोध, अद्वैत वेदांत और मुक्ति की चेतना का सार है। यह पंक्ति प्रसिद्ध “निर्वाण षट्कम्” (Nirvāṇa Ṣaṭkam) या “आत्म षट्कम्” का हिस्सा है, जिसे आदि शंकराचार्य द्वारा रचा गया था। यह श्लोक व्यक्ति को अपनी सच्ची आत्मा की अनुभूति कराने हेतु मार्गदर्शन करता है।
🕉 निर्वाण षट्कम् (Nirvāṇa Ṣaṭkam) – शिवोऽहम् शिवोऽहम् (Shivoham Shivoham) पूरा मंत्र
(रचयिता: आदि शंकराचार्य)
१.
मनो बुद्ध्यहंकार चित्तानि नाहं
न च श्रोत्र जिह्वे न च घ्राण नेत्रे।
न च व्योम भूमिर्न तेजो न वायुः
चिदानन्द रूपः शिवोऽहम् शिवोऽहम्॥१॥
२.
न च प्राण संज्ञो न वै पञ्चवायुः
न वा सप्तधातुः न वा पञ्चकोशः।
न वाक्पाणिपादं न चोपस्थपायु
चिदानन्द रूपः शिवोऽहम् शिवोऽहम्॥२॥
३.
न मे द्वेष रागौ न मे लोभ मोहौ
मदो नैव मे नैव मात्सर्य भावः।
न धर्मो न चार्थो न कामो न मोक्षः
चिदानन्द रूपः शिवोऽहम् शिवोऽहम्॥३॥
४.
न पुण्यं न पापं न सौख्यं न दुःखं
न मन्त्रो न तीर्थं न वेदा न यज्ञाः।
अहं भोजनं नैव भोज्यं न भोक्ता
चिदानन्द रूपः शिवोऽहम् शिवोऽहम्॥४॥
५.
न मे मृत्युशंका न मे जातिभेदः
पिता नैव मे नैव माता न जन्मः।
न बन्धुर् न मित्रं गुरुर्नैव शिष्यः
चिदानन्द रूपः शिवोऽहम् शिवोऽहम्॥५॥
६.
अहं निर्विकल्पो निराकार रूपो
विभुत्वाच्च सर्वत्र सर्वेन्द्रियाणाम्।
न चासङ्गतं नैव मुक्तिर्न मेयः
चिदानन्द रूपः शिवोऽहम् शिवोऽहम्॥६॥
📖 भावार्थ संक्षेप में:
“मैं मन नहीं हूँ, बुद्धि नहीं, अहंकार नहीं, शरीर नहीं, इंद्रियाँ नहीं।
मैं न जन्मा हूँ, न मरता हूँ।
न मुझे धर्म–काम–मोक्ष की चाह है।
मैं केवल चैतन्य और आनंदस्वरूप शिव हूँ — शिवोऽहम्।”
मंत्र का शाब्दिक अर्थ (अक्षरशः अर्थ):
चित् – चैतन्य, शुद्ध चेतना
आनन्द – परम सुख, आंतरिक शांति
रूपः – स्वरूप वाला
शिवः – कल्याणस्वरूप, परमात्मा
अहम् – मैं
चितानन्द रूपः शिवोऽहम् शिवोऽहम्
अर्थ = “मैं चैतन्य और आनंदस्वरूप हूँ। मैं शिव हूँ, मैं शिव हूँ।”
भावार्थ (भावनात्मक अर्थ):
यह मंत्र बताता है कि मनुष्य की असली पहचान शरीर, मन, बुद्धि या इंद्रियों से नहीं है, बल्कि वह शुद्ध चैतन्य है — वही अनन्त, निर्विकार, अखंड आत्मा — शिव।
“मैं शरीर नहीं हूँ, मैं मन नहीं हूँ, मैं केवल आत्मा हूँ, जो आनंद और चेतना से पूर्ण है।”
यह विचार व्यक्ति को अहंकार, भय, बांधनों और मोह से मुक्त करता है।
उत्पत्ति और पृष्ठभूमि:
इस मंत्र की रचना आदि शंकराचार्य ने की थी, जो 8वीं शताब्दी के महान अद्वैत वेदांत आचार्य थे। उन्होंने बाल्यकाल में ही इस आत्मबोध को प्राप्त कर लिया था और इसी ज्ञान के प्रचार हेतु भारतवर्ष का भ्रमण किया।
“निर्वाण षट्कम्” की छह श्लोकों की इस रचना में आत्मा की वास्तविकता को अत्यंत सरल और गहन शब्दों में प्रस्तुत किया गया है।
मंत्र का प्रयोग (Usage):
- ध्यान (Meditation) के समय इस मंत्र का जाप मन को शुद्ध करता है।
- अहंकार और भय के नाश के लिए यह अत्यंत प्रभावी है।
- आत्मबोध और मोक्ष पथ के साधकों को यह मंत्र जागृति देता है।
- इसे स्नान, ध्यान, या ब्रह्ममुहूर्त में जपा जाता है।
मंत्र जाप की विधि:
🔹 समय:
– ब्रह्ममुहूर्त (सुबह 4 से 6 बजे) सर्वश्रेष्ठ है।
– अन्य समयों में भी शुद्ध चित्त से किया जा सकता है।
🔹 स्थान:
– शांत, पवित्र स्थान चुनें।
– कमलासन या सिद्धासन में बैठें।
🔹 विधि:
- तीन बार गहरी श्वास लें और छोड़ें।
- आंखें बंद करें और मन को केंद्रित करें।
- धीरे-धीरे, स्पष्ट उच्चारण में मंत्र जपें:
“चितानन्द रूपः शिवोऽहम् शिवोऽहम्”
- 108 बार (माला से) जप करें।
- अंत में थोड़ी देर मौन ध्यान करें।
मंत्र के लाभ (Benefits):
- आत्म-ज्ञान की प्राप्ति
- मानसिक शांति और स्थिरता
- भय, मोह, अहंकार से मुक्ति
- आध्यात्मिक उन्नति
- ब्रह्मज्ञान की अनुभूति
- स्वभाव में करुणा, विवेक और समत्व
शिवोहम शिवोहम मंत्र का शब्दार्थ और भावार्थ
यह मंत्र “निर्वाण षट्कम्” के नाम से प्रसिद्ध है, जिसे आदि शंकराचार्य ने रचा था। इसका उद्देश्य आत्मा (स्व) की पहचान शरीर, मन, इंद्रियों और संसार से अलग एक शुद्ध चैतन्य (चिदानन्द) रूप में कराना है। नीचे श्लोकों का सरल शब्दार्थ (शब्द-शब्द अर्थ) प्रस्तुत है:
1.
मनो बुद्ध्यहंकार चित्तानि नाहं
न च श्रोत्र जिह्वे न च घ्राण नेत्रे।
न च व्योम भूमिर्न तेजो न वायुः
चिदानन्द रूपः शिवोऽहम् शिवोऽहम्॥
👉 शब्दार्थ:
- मनो – मन
- बुद्धि – बुद्धि
- अहंकार – अहंकार
- चित्तानि – चित्त (स्मृति/चित्तवृत्ति)
- न अहं – मैं नहीं हूँ
- न च – और नहीं
- श्रोत्र – कान
- जिह्वे – जीभ
- घ्राण – नाक
- नेत्रे – आंखें
- व्योम – आकाश
- भूमिः – पृथ्वी
- तेजः – अग्नि (ऊष्मा)
- वायुः – वायु
📜 भावार्थ:
मैं न मन हूँ, न बुद्धि, न अहंकार और न चित्त।
मैं न कान हूँ, न जीभ, न नाक और न आंखें।
मैं न आकाश हूँ, न पृथ्वी, न अग्नि और न वायु।
मैं चिदानन्दस्वरूप (ज्ञान और आनंदस्वरूप) शिव हूँ, शिव हूँ।
2.
न च प्राण संज्ञो न वै पञ्चवायुः
न वा सप्तधातुः न वा पञ्चकोशः।
न वाक्पाणिपादं न चोपस्थपायु
चिदानन्द रूपः शिवोऽहम् शिवोऽहम्॥
👉 शब्दार्थ:
- प्राण संज्ञः – प्राण रूपी चेतना
- पञ्चवायुः – पाँच वायुएँ (प्राण, अपान, समान, उदान, व्यान)
- सप्तधातुः – शरीर की सात धातुएँ (रस, रक्त, मांस, मेद, अस्थि, मज्जा, शुक्र)
- पञ्चकोशः – पाँच आवरण (अन्नमय, प्राणमय, मनोमय, विज्ञानमय, आनंदमय)
- वाक्-पाणि-पादम् – वाणी, हाथ, पैर
- उपस्थ-पायु – प्रजनन और मलत्याग अंग
📜 भावार्थ:
मैं न प्राण हूँ, न पांच वायु, न शरीर की सात धातुएं और न ही पाँच कोश।
मैं न वाणी हूँ, न हाथ, न पैर, और न ही अन्य शरीर के अंग।
मैं चिदानन्दस्वरूप शिव हूँ, शिव हूँ।
3.
न मे द्वेष रागौ न मे लोभ मोहौ
मदो नैव मे नैव मात्सर्य भावः।
न धर्मो न चार्थो न कामो न मोक्षः
चिदानन्द रूपः शिवोऽहम् शिवोऽहम्॥
👉 शब्दार्थ:
- द्वेष-रागौ – द्वेष और राग (वैर और आसक्ति)
- लोभ-मोहौ – लोभ (लालच) और मोह (माया)
- मदः – घमंड
- मात्सर्य – ईर्ष्या
- धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष – जीवन के चार पुरुषार्थ
📜 भावार्थ:
मुझमें न राग है, न द्वेष; न लोभ है, न मोह; न घमंड है और न ईर्ष्या।
मैं धर्म, अर्थ, काम या मोक्ष में भी नहीं हूँ।
मैं चिदानन्दस्वरूप शिव हूँ, शिव हूँ।
4.
न पुण्यं न पापं न सौख्यं न दुःखं
न मन्त्रो न तीर्थं न वेदा न यज्ञाः।
अहं भोजनं नैव भोज्यं न भोक्ता
चिदानन्द रूपः शिवोऽहम् शिवोऽहम्॥
👉 शब्दार्थ:
- पुण्य-पाप – धर्म या अधर्म के कर्मफल
- सौख्यं-दुःखं – सुख और दुःख
- मन्त्र, तीर्थ, वेद, यज्ञ – धार्मिक साधन और कर्म
- भोजन, भोज्य, भोक्ता – भोजन करने वाला, भोजन और खाने की क्रिया
📜 भावार्थ:
मैं न पुण्य हूँ, न पाप, न सुख हूँ और न दुःख।
मैं न मंत्र हूँ, न तीर्थ, न वेद और न यज्ञ।
मैं न भोजन करता हूँ, न खाया जाने वाला हूँ और न ही भोगने वाला हूँ।
मैं चिदानन्दस्वरूप शिव हूँ, शिव हूँ।
5.
न मे मृत्युशंका न मे जातिभेदः
पिता नैव मे नैव माता न जन्मः।
न बन्धुर् न मित्रं गुरुर्नैव शिष्यः
चिदानन्द रूपः शिवोऽहम् शिवोऽहम्॥
👉 शब्दार्थ:
- मृत्युशंका – मृत्यु का भय
- जातिभेदः – जाति या वर्ग का भेद
- पिता-माता – माता-पिता
- बन्धु-मित्र – संबंधी और मित्र
- गुरु-शिष्य – गुरु और शिष्य
📜 भावार्थ:
मुझे मृत्यु का कोई भय नहीं है, न ही मेरा कोई जाति भेद है।
मेरे लिए न पिता है, न माता, न कोई जन्म है।
न ही कोई बंधु है, न मित्र, न गुरु और न शिष्य।
मैं चिदानन्दस्वरूप शिव हूँ, शिव हूँ।
6.
अहं निर्विकल्पो निराकार रूपो
विभुत्वाच्च सर्वत्र सर्वेन्द्रियाणाम्।
न चासङ्गतं नैव मुक्तिर्न मेयः
चिदानन्द रूपः शिवोऽहम् शिवोऽहम्॥
👉 शब्दार्थ:
- निर्विकल्पः – बिना विकल्प (द्वैतहीन)
- निराकार रूपः – बिना रूप का स्वरूप
- विभुत्वात् – सर्वव्यापकता के कारण
- सर्वत्र – हर जगह
- सर्वेन्द्रियाणाम् – सभी इंद्रियों में
- न चासङ्गतं – किसी से जुड़ा नहीं
- नैव मुक्तिः – न ही मोक्ष की आशा
- न मेयः – जिसे मापा जा सके
📜 भावार्थ:
मैं निर्विकल्प (द्वैत रहित) और निराकार हूँ।
मैं सर्वत्र व्याप्त हूँ, सभी इंद्रियों में भी मैं ही हूँ।
मैं किसी से जुड़ा नहीं हूँ, न ही मुझे कोई मुक्ति चाहिए, न मैं मापने योग्य हूँ।
मैं चिदानन्दस्वरूप शिव हूँ, शिव हूँ।
निष्कर्ष:
“चितानन्द रूपः शिवोऽहम् शिवोऽहम्” केवल मंत्र नहीं, बल्कि एक जीवनदर्शन है। यह हमें याद दिलाता है कि हम आत्मा हैं, शरीर नहीं। जब व्यक्ति इस मंत्र को अपने हृदय में धारण करता है, तो संसार की समस्त व्याकुलताएं लुप्त हो जाती हैं, और केवल एक ही सत्य शेष रहता है — “मैं शिव हूँ”।
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