धनतेरस और धन्वन्तरि जयंती क्या है? धनतेरस का असली महत्व जानिए।

विक्रम सम्वत कैलेंडर के अनुसार धनतेरस, कार्तिक माह के कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी के दिन अर्थात दिवाली से दो दिन पहले मनाया जाता है। अगर हम धनतेरस का संधि-विच्छेद करें तो ‘धन’ का मतलब समृद्धि और ‘तेरस’ का मतलब तेरहवां दिन होता है। कहते हैं की इसी दिन भगवन धन्वन्तरि का जन्म समद्र मंथन के दौरान हुआ था।  इसलिए इसे धन्वन्तरि जयंती भी कहते हैं। धनतेरस अर्थात भगवान ‘धन्वंतरि जयंती’ का अर्थ आयुर्वेद के अनुसार प्रकृति, औषधि, वनस्पति और प्रकृति की गोद में उपजी प्राकृतिक निधियों की पूजा है।

भगवान धन्वन्तरि को आरोग्य का देवता भी कहते हैं। इन्हे भगवान विष्णु का अवतार बतया जाता है, जिनकी चार भुजायें हैं। उपर की दोंनों भुजाओं में शंख और चक्र धारण किये हुये, जबकि दो अन्य भुजाओं मे से एक में औषधि तथा दूसरे में पीतल का अमृत कलश लिये हुये हैं। हम सभी जानते हैं की पीतल के बर्तन बहुत शुद्ध होते हैं, और हिन्दू धर्म में पीतल का बहुत ही महत्व है। हिन्दू धर्म में पवित्र कार्यो में पीतल और ताम्बे की वस्तुओं का उपयोग होता है। यही कारण है की धनतेरस के दिन पीतल के बर्तनों के खरीदने का प्रचलन भी है। 

भारत सरकार ने धनतेरस को राष्ट्रीय आयुर्वेद दिवस के रूप में मनाने का निर्णय लिया है।

धनतेरस का असली महत्व 

ऐसा लगता है की मुग़लो, तुर्कों, मंगोलों, डचों और अंग्रेजों के भारतवर्ष पर आधिपत्य जमाने के बाद उन्होंने जो भारतवर्ष के प्राचीन ज्ञान-विज्ञान, धर्म, अध्यात्म, साहित्य, शिक्षा आदि पर कुठाराघात किया था, वो बहुत हद तक सफल रहे, और हम भारतवासी अपने महान ऋषि मुनियो के द्वारा दी गयी अद्भुत जानकारियों से हाथ धो बैठे, या यूँ कहे की गुलामी की आदत ने हमारे तर्क-वितर्क की परंपरा को ख़त्म कर दिया, जो हमारे सनातन धर्म का आधार है। सनातनी हमेशा से तार्किक रहे हैं ना की किसी की कही बात पर सिर्फ विश्वास करने वाले, क्योंकि आपने जिस दिन सिर्फ विश्वास पर धर्म का अनुपालन शुरू कर दिया फिर आप खोज से वंचित हो जाओगे। हमारे वेद हमें प्रगतिशील, तर्कवादी, विज्ञानवादी, धर्मवादी, अध्यात्मवादी और परोपकारी बनने का संदेश देते हैं, प्रेरणा देते हैं।

आज धनतेरस को हमने सोना-चाँदी, हीरे-जवाहरात, धन-दौलत, गाड़ी-बंगले से जोड़ दिया है और इस पर्व के मानाने के पीछे के वास्तविक कारण को भूल चुके हैं। यह लेख आपको धनतेरस के असली महत्ता को समझाने की एक कोशिश है। धनतेरस पर्व के मानाने का जो मूल कारण है, वो है भगवन धन्वन्तरि की पूजा करना, जो आयुर्वेद के / चिकित्सा के देवता मने गए हैं। भगवान धन्वन्तरि के अनुसार, सौ प्रकार की मृत्यु होती है। उनमे एक ही काल मृत्यु है, बाकि सारी अकाल मृत्यु है। अकाल मृत्यु को रोकने के प्रयास को ही निदान या चिकित्सा कहा जाता है। 

धनतेरस का असली महत्व अपने स्वास्थ्य के लिए पूजा करना है, ना की धन की लालसा। हमारे शास्त्रों में कहा भी गया है, ‘पहला सुख निरोगी काया, दूजा सुख घर में माया’। मतलब, लक्ष्मी जी का स्थान स्वास्थ्य के बाद आता है। इसलिए पवित्र कार्तिक माह के पाँच-दिवसीय त्यौहार (धनतेरस, रूप चतुर्दशी, दीवाली, गोवर्धन पूजा, एवं भाई दूज) में सबसे पहले धनतेरस को धन्वंतरि पूजन में भगवान से स्वस्थ रहने की प्रार्थना करने और दीपावली पर लक्ष्मी पूजन करने को कहा है। ये पाँच दिवसीय त्यौहार हमें क्रमशः स्वास्थ्य, समृद्धि, प्रकाश से अंधकार को दूर भगाना, अन्न-समृद्धि व रिश्तों की प्रगाढ़ता का पथ दिखाते हैं।

हमारा दुर्भाग्य है की स्वास्थ्य के देवता धनवंतरी जी के जन्मदिन को भी हमने धन-दौलत से जोड़ दिया है, लेकिन वास्तविकता ये है कि दुनिया की कोई भी दौलत अच्छी सेहत का वचन नहीं दे सकती। हमने भगवान धनवंतरी के पीतल के कलश पर तो ध्यान दिया, लेकिन उसके अंदर की औषधि और स्वस्थ जीवन के संदेश को महत्व नहीं दिया। हमें धनतेरस को उसके सही अर्थ में मनाना चाहिए और खाली कलश को प्राथमिकता देने के बजाए स्वस्थ जीवन के संदेश को प्राथमिकता देनी चाहिए। उम्मीद है कि अब आपको धनतेरस का असली मतलब और महत्व समझ में आ गया होगा। आइये मिलकर अपने पर्व-त्योहारों के पीछे के हमारे ऋषि-मुनियों के आध्यात्मिक और वैज्ञानिक कारणों को लोगो तक फ़ैलाने का प्रयास करें और अपनी प्राचीनतम और समृद्ध संस्कृति को आगे ले जाने में सहायक बनें। 

धनतेरस के दिन हम प्रार्थना करें की आयुर्वेद के जनक धन्वंतरि देव समस्त जगत को निरोग कर मानव समाज को दीर्घायुष्य प्रदान करें। हमें सपरिवार आरोग्य का वरदान प्रदान करें। धन्वन्तरि जयंती (धनतेरस) का असली अर्थ प्रकृति की अनुकूलता प्राप्त करके, प्रकृति की असीम अनुकंपा प्राप्त करना है। आयुर्वेद के अनुसार, चारो पुरुषार्थ – धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष की प्राप्ति स्वस्थ शरीर और दीर्घायु से ही हो सकती है।

भगवान धनवंतरी को खुश करने के लिए इस मंत्र का करें जाप

देवान कृशान सुरसंघनि पीडितांगान, दृष्ट्वा दयालुर मृतं विपरीतु कामः पायोधि मंथन विधौ प्रकटौ भवधो, धन्वन्तरि: स भगवानवतात सदा नः ॐ धन्वन्तरि देवाय नमः ध्यानार्थे अक्षत पुष्पाणि समर्पयामि…

भगवाण धन्वंतरी की साधना के लिये एक साधारण मंत्र भी है:

ॐ धन्वंतरये नमः॥

इसके अलावा उनका एक और मंत्र भी है:

ॐ नमो भगवते महासुदर्शनाय वासुदेवाय धन्वंतरये | अमृतकलशहस्ताय सर्वभयविनाशाय सर्वरोगनिवारणाय ||

त्रिलोकपथाय त्रिलोकनाथाय श्री महाविष्णुस्वरूपाय | श्रीधन्वंतरीस्वरूपाय श्रीश्रीश्री औषधचक्राय नारायणाय नमः॥

(Om namo bhagwate mahasudarshanay vasudevay dhanvantaraye. Amrit kalash hastay sarvabhay vinashay sarvarog nivaranay. Triokpathay triloknathay shri maha vishnu sawaroopay. Shri dhanvanatari swaroopaya shri shri shri ausadh chakray naranayany namah.)

अर्थात – हम उन भगवान से प्रार्थना करते हैं, जिन्हें सुदर्शन वासुदेव धनवंतरी के रूप में जाना जाता है, जो अमरता के अमृत से भरे बर्तन को धारण करते हैं। भगवान धन्वंतरि सभी भय को दूर करें, हमारे सभी रोगों को दूर करें। भगवान विष्णु जो भगवान धन्वन्तरि के रूप को धारण किये हुए हैं, जो हमारे पालक और शुभचिंतक हैं और तीनों लोकों के संरक्षक हैं जो जीव आत्माओं को चंगा करने के लिए सशक्त हैं। हम आपको नमन करते हैं।

इसके अलावा एक और मंत्र है:

ॐ नमो भगवते धन्वन्तरये अमृतकलशहस्ताय सर्व आमय | विनाशनाय त्रिलोकनाथाय श्रीमहाविष्णुवे नम: ||

(Om Namo Bhagavate Vasudevaaya Dhanvantaraye Amrita-kalasha HastaayaSarva-amaya Vinashaaya Trailokya Naathaya Dhanvantri Maha-vishnave Namaha.)

अर्थात – मैं भगवान धन्वंतरि को नमन करता हूँ। भगवान के चार हाथों में से एक में शंख, दूसरे में चक्र, तीसरे में औषध, चौथे हाथ में अमर अमृत के पात्र है। उसके दिल में प्रकाश की एक मनभावन और शानदार चमक है। उनके ललाट और सुंदर कमलनयन के चारों ओर प्रकाश भी चमक रहा है। उनका दिव्य रूप का प्रकाश सभी बीमारियों को जड़ समूल नष्ट कर देता है।

धनत्रयोदशी – धनतेरस यमदीप दान मंत्र

मृत्युना पाशदण्डाभ्याम् कालेन श्यामया सह । त्रयोदश्यां दीपदानात् सूर्यजः प्रीयतां मम ॥

(Mrityuna pashdandabhyam kalen shyamaya sah. Trayodashyam deepdanant suryajah priyatam mam.)

इस मंत्र का अर्थ है: इसका अर्थ है, धनत्रयोदशी (धनतेरस) पर यह दीप मैं मृत्यु तथा काल के अधिष्ठाता सूर्यपुत्र यमदेवता को अर्पित करता हूं। त्रयोदशी के इस दीपदान से यमदेव, देवी श्यामला सहित मुझ पर प्रसन्न हो। तथा मृत्यु के पाश से वे मुझे मुक्त करें और मेरा कल्याण करें।

स्कंद पुराण तथा पद्म पुराण के अनुसार धनतेरस को यम दीपदान जरूर करना चाहिए। ऐसा करने से अकाल मृत्यु का भय समाप्त होता है। पूरे वर्ष में एक मात्र यही वह दिन है, जब मृत्यु के देवता यमराज की पूजा सिर्फ दीपदान करके की जाती है। कुछ लोग नरक चतुर्दशी के दिन भी यम दीपदान करते हैं।

स्कंद पुराण तथा पद्म पुराण में कहा गया है
कार्तिकस्यासिते पक्षे त्रयोदश्यां तु पावके।
यमदीपं बहिर्दद्यादपमृत्युर्विनश्यति।।

(kartiksyasite pakshe trayodashyam tu pavake | Yamdeepam bahirdadyadap mrityurvinashyati ||)
अर्थात् कार्तिक मास के कृष्णपक्ष की त्रयोदशी को घर से बाहर यमराज के लिए दीप देना चाहिए इससे दुरमृत्यु का नाश होता है।

लक्ष्मी गायत्री मंत्र (Dhanteras Laxmi Mantra)

“महालक्ष्यमये च विधमहे विष्णु I पतन्ये च धीमहे तन्नो लक्ष्मी प्रचोदयात “

(Mahalakshyamaye cha vidhmahe vishnu. Patanye cha dhimahe tanno lakshmi prachodayat.)

अर्थ: इसका अर्थ ईश्वर अथवा परमपिता परमात्मा रुप मां महालक्ष्मी जो भगवान श्री हरि अर्थात भगवान विष्णु की पत्नी हैं हम उनका ध्यान धरते हैं। वे मां लक्ष्मी हमें सदमार्ग पर चलने की प्रेरणा दें। अर्थात हम मां महालक्ष्मी का स्मरण करते हैं एवं उनसे प्रार्थना करते हैं कि वे हम पर अपनी कृपा बनाएं रखें। ऐसा मन जाता है की इस लक्ष्मी गायत्री मंत्र का जाप करने से आपके रुतबा, पद, पैसा, यश व भौतिक सुख-सुविधाओं में शीघ्र ही बढ़ोतरी होने लगती है।

कुबेर मंत्र (श्रीधनलक्ष्मीस्तोत्रम् से लिया गया एक मंत्र) – (Kuber Mantra – taken from Shri Dhanalaxmistrotam)

धनदाय नमस्तुभ्यम निधिपद्माधिवाय च I भवन्तु त्वत्प्रसादान्मे धन धन्यदिसेम्पध।। 

(Dhanadhaya namasthubhyam nidhi padmadhipaya cha, Bhavathu thwad pasadaanme, dhana dhanyadhi sampadha)

अर्थात्, हे धन के प्रदाता कुबेर, जो लोगो को धन-दौलत देकर धनवान बनाते हैं, हम आपको सर झुककर प्रणाम करते हैं। मुझे आप आशीर्वाद दे ताकि आपके लालित्य से हम समृद्ध हो जायें।  

भगवान धन्वन्तरि जी की आरती 

जय धन्वंतरि देवा, जय धन्वंतरि जी देवा। जरा-रोग से पीड़ित, जन-जन सुख देवा।।जय धन्वं.।।

तुम समुद्र से निकले, अमृत कलश लिए। देवासुर के संकट आकर दूर किए।।जय धन्वं.।। 

आयुर्वेद बनाया, जग में फैलाया। सदा स्वस्थ रहने का, साधन बतलाया।।जय धन्वं.।। 

भुजा चार अति सुंदर, शंख सुधा धारी। आयुर्वेद वनस्पति से शोभा भारी।।जय धन्वं.।। 

तुम को जो नित ध्यावे, रोग नहीं आवे। असाध्य रोग भी उसका, निश्चय मिट जावे।।जय धन्वं.।। 

हाथ जोड़कर प्रभुजी, दास खड़ा तेरा। वैद्य-समाज तुम्हारे चरणों का घेरा।।जय धन्वं.।। 

धन्वंतरिजी की आरती जो कोई नर गावे। रोग-शोक न आए, सुख-समृद्धि पावे।।जय धन्वं.।।

धनतेरस के दिन भगवान धन्वंतरि के साथ माता लक्ष्मी की भी आरती उतारें।

लक्ष्मी जी की आरती (Laxmi Ji Ki Aarti) : 

ॐ जय लक्ष्मी माता, मैया जय लक्ष्मी माता । तुमको निस दिन सेवत हर-विष्णु-धाता ॥ॐ जय.।।

उमा, रमा, ब्रह्माणी, तुम ही जग-माता । सूर्य-चन्द्रमा ध्यावत, नारद ऋषि गाता ॥ॐ जय.।।

तुम पाताल-निरंजनि, सुख-सम्पत्ति-दाता । जो कोई तुमको ध्यावत, ऋद्धि-सिद्धि-धन पाता ॥ॐ जय.।। 

तुम पाताल-निवासिनि, तुम ही शुभदाता । कर्म-प्रभाव-प्रकाशिनि, भवनिधि की त्राता ॥ॐ जय.।। 

जिस घर तुम रहती, तहँ सब सद्गुण आता । सब सम्भव हो जाता, मन नहिं घबराता ॥ॐ जय.।। 

तुम बिन यज्ञ न होते, वस्त्र न हो पाता । खान-पान का वैभव सब तुमसे आता ॥ॐ जय.।। 

शुभ-गुण-मंदिर सुन्दर, क्षीरोदधि-जाता । रत्न चतुर्दश तुम बिन कोई नहिं पाता ॥ॐ जय.।। 

महालक्ष्मीजी की आरती, जो कई नर गाता । उर आनन्द समाता, पाप शमन हो जाता ॥ॐ जय.।।

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